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mahabharat 3.225.38: इससे पृथ्वी को बहुत कष्ट हुआ। वह सब ओर से फट गई और दुःखी होकर भगवान कार्तिकेय की शरण लेने पर पुनः सुदृढ़ और सुन्दर हो गई ॥38॥   |   mahabharat अध्याय 3.225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.225.38 
तत: प्रव्यथिता भूमिर्व्यशीर्यत समन्तत:।
आर्ता स्कन्दं समासाद्य पुनर्बलवती बभौ॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
इससे पृथ्वी को बहुत कष्ट हुआ। वह सब ओर से फट गई और दुःखी होकर भगवान कार्तिकेय की शरण लेने पर पुनः सुदृढ़ और सुन्दर हो गई ॥38॥
 
Due to this the earth suffered a lot. It was torn from all sides and on seeking refuge in Lord Kartikeya in pain, it again became strong and beautiful. ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)