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mahabharat 3.225.37: इस प्रकार कार्तिकेय की शक्ति के प्रहार से विक्षिप्त होकर वह श्वेत पर्वत उस महान आत्मा के भय से भयभीत हो गया और अन्य पर्वतों के साथ इस पृथ्वी को छोड़कर आकाश में उड़ गया।   |   mahabharat अध्याय 3.225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.225.37 
स तेनाभिहतो दीर्णो गिरि: श्वेतोऽचलै: सह।
उत्पपात महीं त्यक्त्वा भीतस्तस्मान्महात्मन:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार कार्तिकेय की शक्ति के प्रहार से विक्षिप्त होकर वह श्वेत पर्वत उस महान आत्मा के भय से भयभीत हो गया और अन्य पर्वतों के साथ इस पृथ्वी को छोड़कर आकाश में उड़ गया।
 
Thus being pierced by the blow of Kartikeya's Shakti, the white mountain became frightened in fear of that great soul and left this earth along with the other mountains and flew into the sky.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)