श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.225.35 
स तं नादं भृशार्तानां श्रुत्वापि बलिनां वर:।
न प्राच्यवदमेयात्मा शक्तिमुद्यम्य चानदत्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वे महाबली कुमार, जो बलवानों में श्रेष्ठ और अपार आत्मविश्वास से युक्त थे, उन अत्यन्त व्यथित पर्वतों की चीखों से भी विचलित नहीं हुए, अपितु उन्होंने शक्ति को हाथ में उठा लिया और सिंह के समान दहाड़ने लगे।
 
That great Kumara, best among the strong and endowed with immense self-confidence, was not shaken even by the cries of those utterly distressed mountains; instead, he picked up Shakti in his hand and began to roar like a lion. 35.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)