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mahabharat 3.225.33: उन बाणों से उसने हिमालयपुत्र क्रौंच पर्वत को छिन्न-भिन्न कर दिया। उसी छिद्र से होकर हंस और गीध मेरु पर्वत पर जाते हैं ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.225.33 
बिभेद स शरै: शैलं क्रौञ्चं हिमवत: सुतम्।
तेन हंसाश्च गृध्राश्च मेरुं गच्छन्ति पर्वतम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
उन बाणों से उसने हिमालयपुत्र क्रौंच पर्वत को छिन्न-भिन्न कर दिया। उसी छिद्र से होकर हंस और गीध मेरु पर्वत पर जाते हैं ॥33॥
 
With those arrows he disintegrated Mount Krauncha, the son of Himalaya. Through the same hole, swans and vultures go to Mount Meru. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)