श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 28-30
 
 
श्लोक  3.225.28-30 
पर्वताग्रेऽप्रमेयात्मा रश्मिमानुदये यथा।
स तस्य पर्वतस्याग्रे निषण्णोऽद्‍भुतविक्रम:॥ २८॥
व्यलोकयदमेयात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिश:।
स पश्यन् विविधान् भावांश्चकार निनदं पुन:॥ २९॥
तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन् बहुधा जना:।
भीताश्चोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं ययु:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
अनन्त आत्मविश्वास और अद्भुत पराक्रम से संपन्न स्कन्द पर्वत की चोटी पर सूर्योदय के समय किरणों से युक्त सूर्य के समान शोभायमान हो रहे थे। तब वे उस पर्वत की चोटी पर बैठकर अपने अनेक मुखों से सम्पूर्ण दिशाओं में देखने लगे। नाना प्रकार की वस्तुओं को देखकर भोले स्कन्द पुनः बालक के समान कोलाहल करने लगे। उनकी गर्जना सुनकर बहुत से प्राणी पृथ्वी पर गिर पड़े। तब भयभीत और चिन्तित होकर वे सब उनकी शरण में गए॥28-30॥
 
Endowed with infinite self-confidence and amazing valour, Skanda was looking beautiful on the peak of the mountain like the Sun with rays at sunrise. Then he sat on the peak of that mountain and started looking in all directions through his many faces. Seeing various things, the innocent Skanda again started making noise like a child. Hearing his roar, many creatures fell on the earth. Then, frightened and worried, all of them took refuge in him.॥28-30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)