श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 13-15
 
 
श्लोक  3.225.13-15 
सप्तानामपि सा देवी सप्तर्षीणां महात्मनाम्॥ १३॥
पत्नीसरूपतां कृत्वा कामयामास पावकम्।
दिव्यरूपमरुन्धत्या: कर्तुं न शकितं तया॥ १४॥
तस्यास्तप:प्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च।
षट्कृत्वस्तत् तु निक्षिप्तमग्ने रेत: कुरूत्तम॥ १५॥
 
 
अनुवाद
कुरुश्रेष्ठ! उस देवी ने सात महात्मा सप्तर्षियों की पत्नियों का रूप धारण करके अग्निदेव के साथ मिलन की इच्छा की थी; किन्तु अरुन्धती की तपस्या तथा उसके पति और ननद के प्रभाव के कारण वह उनका दिव्य रूप धारण न कर सकी, अतः वह अग्नि के वीर्य को वहाँ केवल छः बार ही डालने में सफल हुई ॥13-15॥
 
Kurushrestha! That goddess had desired to unite with Agnidev by taking the form of the wives of the seven Mahatma Saptarishis; But due to the penance of Arundhati and the influence of her husband and sister-in-law, she could not assume his divine form, hence she succeeded in pouring Agni's semen there only six times. 13-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)