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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  3.225.11-12h 
दृष्टीविषै: सप्तशीर्षैर्गुप्तं भोगिभिरद्‍भुतै:।
रक्षोभिश्च पिशाचैश्च रौद्रैर्भूतगणैस्तथा॥ ११॥
राक्षसीभिश्च सम्पूर्णमनेकैश्च मृगद्विजै:।
 
 
अनुवाद
सात सिर वाले सर्प, जिनकी दृष्टि मात्र से विष भरा हुआ था, उस पर्वत की रक्षा करते थे। उनके अतिरिक्त, वह पर्वत दैत्यों, पिशाचों, भयानक भूतों, राक्षसी समुदायों तथा असंख्य पशु-पक्षियों से भी भरा हुआ था।
 
Seven-headed serpents, whose mere glance was full of poison, protected that mountain. Besides them, that mountain was also filled with demons, goblins, terrifying ghosts, demonic communities and numerous animals and birds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)