श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.225.10 
मार्कण्डेय उवाच
सुपर्णी सा तदा भूत्वा निर्जगाम महावनात्।
अपश्यत् पर्वतं श्वेतं शरस्तम्बै: सुसंवृतम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं - हे राजन! ऐसा कहकर वह तुरंत गरुड़ का रूप धारण करके उस महान वन से बाहर चली गईं। आगे जाकर उन्होंने सरकण्डों के समूह से आच्छादित एक श्वेत पर्वत का शिखर देखा।
 
Markandeya says - O King! Saying this, she immediately assumed the form of Garudi and went out of that great forest. Going further, she saw the peak of a white mountain covered with a group of reeds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)