Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.224.41-42: मैं अग्नि के प्रति काम-ग्रस्त हूँ। अतः मैं स्वयं सप्त ऋषियों की पत्नियों का रूप धारण करके अग्निदेव को चाहूँगा; क्योंकि वे उनकी सुन्दरता पर मोहित हो रहे हैं। ऐसा करने से वे प्रसन्न होंगे और मेरी भी इच्छा पूरी होगी।॥41-42॥ | mahabharat अध्याय 3.224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम्॥ ४१॥
कामयिष्यामि कामार्ता तासां रूपेण मोहितम्।
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत्॥ ४२॥
अनुवाद
मैं अग्नि के प्रति काम-ग्रस्त हूँ। अतः मैं स्वयं सप्त ऋषियों की पत्नियों का रूप धारण करके अग्निदेव को चाहूँगा; क्योंकि वे उनकी सुन्दरता पर मोहित हो रहे हैं। ऐसा करने से वे प्रसन्न होंगे और मेरी भी इच्छा पूरी होगी।॥41-42॥
I am suffering from lust for Agni. Therefore, I will myself take the form of the seven sages' wives and desire Agnidev; because he is getting fascinated by their beauty. By doing this, he will be pleased and my desire will also be fulfilled.'॥ 41-42॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने स्कन्दोत्पत्तौ चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्तिविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥