श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.224.36 
मार्कण्डेय उवाच
संस्पृशन्निव सर्वास्ता: शिखाभि: काञ्चनप्रभा:।
पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रित:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन! ऐसा निश्चय करके अग्रिदेव ने गार्हपत्य अग्नि का आश्रय लिया और अपनी ज्वालाओं से स्वर्ग के समान चमकने वाली उन ऋषि-पत्नियों को स्पर्श करके और देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न होने लगे॥36॥
 
Markandeyaji says- Rajan! Having decided this, Agridev took shelter in the Garhapatya fire and by touching and seeing those sage-wives who were shining like heaven with their flames, he started feeling very happy. 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)