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mahabharat 3.224.14: अग्निदेव भी भृगु और अंगिरा गोत्र के ऋषियों द्वारा पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर हवन में दी गई आहुतियों को ग्रहण करके सूर्य में प्रवेश करते हैं ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 3.224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.224.14 
भृगुभिश्चाङ्गिरोभ्यश्च हुतं मन्त्रै: पृथग्विधै:।
हव्यं गृहीत्वा वह्निं च प्रविशन्तं दिवाकरम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अग्निदेव भी भृगु और अंगिरा गोत्र के ऋषियों द्वारा पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर हवन में दी गई आहुतियों को ग्रहण करके सूर्य में प्रवेश करते हैं ॥14॥
 
Even the god Agni enters the Sun after consuming the offerings made in the havan by the sages of the Bhrigu and Angira gotras after reciting separate mantras. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)