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mahabharat 3.224.10: मार्कण्डेय कहते हैं - हे राजन! देवसेना के वचन सुनकर इन्द्र अत्यन्त दुःखी हो गए और सोचने लगे कि 'यह देवी जिस प्रकार का पति बता रही है, वैसा पति पाना सम्भव नहीं जान पड़ता।'॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 224: इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.224.10 
मार्कण्डेय उवाच
इन्द्रस्तस्या वच: श्रुत्वा दु:खितोऽचिन्तयद् भृशम्।
अस्या देव्या: पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं - हे राजन! देवसेना के वचन सुनकर इन्द्र अत्यन्त दुःखी हो गए और सोचने लगे कि 'यह देवी जिस प्रकार का पति बता रही है, वैसा पति पाना सम्भव नहीं जान पड़ता।'॥10॥
 
Mārkaṇḍeya says - O King! On hearing Devasena's words, Indra became very sad and started thinking, 'It does not seem possible for this goddess to find a husband like the one she is describing.'॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)