श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 223: इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.223.15 
हित्वा कन्यां महाभागां प्राद्रवद् भृशपीडित:।
अपयातेऽसुरे तस्मिंस्तां कन्यां वासवोऽब्रवीत्।
कासि कस्यासि किञ्चेह कुरुषे त्वं शुभानने॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस आघात से अत्यन्त दुःखी होकर राक्षस उस परम सौभाग्यवती कन्या को छोड़कर भाग गया। राक्षस के भाग जाने पर इन्द्र ने उस कन्या से पूछा - 'सुमुखी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और यहाँ क्या करती हो?'॥15॥
 
The demon, deeply pained by that blow, left the extremely fortunate girl and ran away. After the demon ran away, Indra asked the girl - 'Sumukhi! Who are you? Whose daughter are you? And what do you do here?'॥ 15॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने स्कन्दोत्पत्तौ केशिपराभवे त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानप्रकरणमें स्कन्दकी उत्पत्तिके विषयमें केशिपराभवविषयक दो सौ तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २२३॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १७ १/२ श्लोक हैं)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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