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mahabharat 3.222.4: ‘जो अद्भुत अग्नि अग्निगृहपति के नाम से यज्ञ में सदैव पूजित रहती है और जो देवताओं को हवि पहुँचाती है, वही इस जगत् को पवित्र करने वाली है॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.222: सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुन: उनका प्राकटॺ   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 222: सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुन: उनका प्राकटॺ  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.222.4 
अग्निर्गृहपतिर्नाम नित्यं यज्ञेषु पूज्यते।
हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावक:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
‘जो अद्भुत अग्नि अग्निगृहपति के नाम से यज्ञ में सदैव पूजित रहती है और जो देवताओं को हवि पहुँचाती है, वही इस जगत् को पवित्र करने वाली है॥4॥
 
‘The wonderful fire which is always worshiped in the yagya in the name of Agni Grihapati and who delivers the offerings to the gods, is the one who purifies this world. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)