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mahabharat 3.222.31-32h: यह जानना चाहिए कि ये आदिदेव अग्निदेव, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं। जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्भिद् आदि अनेक रूपों में प्रकट हुए हैं, वैसे ही वही अग्नितत्त्व प्रजापति के शरीर से अनेक रूपों में उत्पन्न हुआ है। 31 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.222: सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुन: उनका प्राकटॺ   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 222: सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुन: उनका प्राकटॺ  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  3.222.31-32h 
एक एवैष भगवान् विज्ञेय: प्रथमोऽङ्गिरा:॥ ३१॥
बहुधा नि:सृत: कायाज्ज्योतिष्टोम: क्रतुर्यथा।
 
 
अनुवाद
यह जानना चाहिए कि ये आदिदेव अग्निदेव, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं। जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्भिद् आदि अनेक रूपों में प्रकट हुए हैं, वैसे ही वही अग्नितत्त्व प्रजापति के शरीर से अनेक रूपों में उत्पन्न हुआ है। 31 1/2॥
 
It should be known that this first Lord Agni, who is also called Angira, is one and the same. Just as Jyotishtom Yagya has appeared in many forms like Udbhid etc., similarly the same Agni Tattva has arisen in various forms from the body of Prajapati. 31 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)