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mahabharat 3.220.7: उन्होंने अपने मस्तक से बृहत् और मुख से रथन्तर साम को प्रकट किया। ये दोनों ही आयु आदि को शीघ्र ही दूर करने वाले हैं, इसीलिए इन्हें 'तारसाहार' कहते हैं। फिर उन्होंने नाभि से रुद्र, बल से इन्द्र, श्वास से वायु और अग्नि को उत्पन्न किया॥7॥   |   mahabharat अध्याय 3.220: पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 220: पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.220.7 
बृहद् रथन्तरं मूर्ध्नो वक्त्राद् वा तरसाहरौ।
शिवं नाभ्यां बलादिन्द्रं वाय्वग्नी प्राणतोऽसृजत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने अपने मस्तक से बृहत् और मुख से रथन्तर साम को प्रकट किया। ये दोनों ही आयु आदि को शीघ्र ही दूर करने वाले हैं, इसीलिए इन्हें 'तारसाहार' कहते हैं। फिर उन्होंने नाभि से रुद्र, बल से इन्द्र, श्वास से वायु और अग्नि को उत्पन्न किया॥7॥
 
He manifested Brihat from his head and Rathantara Sama from his mouth. Both of them rapidly remove age etc., that is why they are called 'Tarsahaar'. Then he created Rudra from the navel, Indra from the force and air and fire from the breath. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)