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mahabharat 3.220.4: भरत! उसका सिर प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहा था, उसकी भुजाएँ प्रभाकर की प्रभा के समान थीं, उसकी आँखें और त्वचा सोने के समान चमक रही थीं और उसकी पिंडलियाँ काले रंग की दिखाई दे रही थीं।   |   mahabharat अध्याय 3.220: पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 220: पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.220.4 
समिद्धोऽग्नि: शिरस्तस्य बाहू सूर्यनिभौ तथा।
त्वङ्नेत्रे च सुवर्णाभे कृष्णे जङ्घे च भारत॥ ४॥
 
 
अनुवाद
भरत! उसका सिर प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहा था, उसकी भुजाएँ प्रभाकर की प्रभा के समान थीं, उसकी आँखें और त्वचा सोने के समान चमक रही थीं और उसकी पिंडलियाँ काले रंग की दिखाई दे रही थीं।
 
Bharata! His head was shining like a blazing fire, his arms were like the radiance of Prabhakar, his eyes and skin were shining like gold and his calves appeared black in colour.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)