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mahabharat 3.220.16: इसीलिए यज्ञ में निपुण विद्वानों ने इन विनायकों के लिए यज्ञशाला की बाह्य वेदी पर उचित भाग रखने का नियम प्रारंभ किया है; क्योंकि ये विनायक अग्नि स्थापना स्थान के निकट नहीं जाते॥16॥   |   mahabharat अध्याय 3.220: पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 220: पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.220.16 
बहिर्वेद्यां तदादानं कुशलै: सम्प्रवर्तितम्।
तदेते नोपसर्पन्ति यत्र चाग्नि: स्थितो भवेत्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
इसीलिए यज्ञ में निपुण विद्वानों ने इन विनायकों के लिए यज्ञशाला की बाह्य वेदी पर उचित भाग रखने का नियम प्रारंभ किया है; क्योंकि ये विनायक अग्नि स्थापना स्थान के निकट नहीं जाते॥16॥
 
That is why the scholars adept in Yagya have started the rule of keeping the due portion for these Vinayakas on the outer altar of the Yagyashala; Because these Vinayaks do not go near the place where fire is established. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)