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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.22.53 
समवाय: स राजेन्द्र सुमहाद्‍भुतदर्शन:।
आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंश के रत्न राजा जनमेजय! उस समय काम्यकवन में उन महात्माओं की अद्भुत सभा एकत्रित हुई थी।
 
King Janamejaya, the jewel of the Bharata dynasty! At that time a wonderful gathering of those great souls had gathered in the Kamyakavana. 53.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)