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mahabharat 3.22.4: तत्पश्चात् जब मैं निर्भय और अविचलित होकर खड़ा हुआ और अपने अस्त्रों से उन पर प्रहार करने लगा, तब सौभाग्य में निवास करने वाले विकृत मुख और लंबे केश वाले राक्षस जोर-जोर से चिल्लाने लगे॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.22.4 
अथ दानवसङ्घास्ते विकृताननमूर्धजा:।
उदक्रोशन् महाराज विष्ठिते मयि भारत॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् जब मैं निर्भय और अविचलित होकर खड़ा हुआ और अपने अस्त्रों से उन पर प्रहार करने लगा, तब सौभाग्य में निवास करने वाले विकृत मुख और लंबे केश वाले राक्षस जोर-जोर से चिल्लाने लगे॥4॥
 
Thereafter when I stood fearlessly and unwaveringly and began attacking them with my weapons, the demons residing in Saubhagya with distorted faces and long hair started screaming loudly. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)