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mahabharat 3.22.34: सौभाग्य के पास पहुँचकर वह दिव्य अस्त्र समस्त तेज से रहित हो गया और जैसे आरी लकड़ी के लम्बे टुकड़े को काट देती है, उसी प्रकार उसने सौभाग्य विमान को दो टुकड़ों में काट डाला।   |   mahabharat अध्याय 3.22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.22.34 
तत् समासाद्य नगरं सौभं व्यपगतत्विषम्।
मध्येन पाटयामास क्रकचो दार्विवोच्छ्रितम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
सौभाग्य के पास पहुँचकर वह दिव्य अस्त्र समस्त तेज से रहित हो गया और जैसे आरी लकड़ी के लम्बे टुकड़े को काट देती है, उसी प्रकार उसने सौभाग्य विमान को दो टुकड़ों में काट डाला।
 
That divine weapon, on reaching Saubhagyaan, devoid of any glory and, just as a saw cuts a tall piece of wood, in the same way it cut the Saubhagya aircraft in half.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)