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mahabharat 3.22.33: आकाश में जाते ही उस सुदर्शन चक्र का रूप प्रलयकाल में उदित होने वाले दूसरे सूर्य के समान प्रकाशित हो गया ॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.22.33 
रूपं सुदर्शनस्यासीदाकाशे पततस्तदा।
द्वितीयस्येव सूर्यस्य युगान्ते प्रपतिष्यत:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
आकाश में जाते ही उस सुदर्शन चक्र का रूप प्रलयकाल में उदित होने वाले दूसरे सूर्य के समान प्रकाशित हो गया ॥33॥
 
As soon as it went into the sky, the form of that Sudarshan Chakra became illuminated like the second sun rising in the time of doomsday. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)