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mahabharat 3.22.11: राजेन्द्र! लगातार पत्थरों की वर्षा से बार-बार टकराने से मुझे ऐसा महसूस होने लगा जैसे मैं पहाड़ों से ढका हुआ एक मेहराब हूँ। 11.   |   mahabharat अध्याय 3.22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 22: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने-अपने नगरको प्रस्थान  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.22.11 
सोऽहं पर्वतवर्षेण वध्यमान: पुन: पुन:।
वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितोऽभवम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! लगातार पत्थरों की वर्षा से बार-बार टकराने से मुझे ऐसा महसूस होने लगा जैसे मैं पहाड़ों से ढका हुआ एक मेहराब हूँ। 11.
 
Rajendra! Being repeatedly hit by the incessant rain of boulders I began to feel like an arch covered with mountains. 11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)