श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 219: बृहस्पतिकी संततिका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.219.17 
अन्तराग्नि: स्मृतो यस्तु भुक्तं पचति देहिनाम्।
स जज्ञे विश्वभुङ्नाम सर्वलोकेषु भारत॥ १७॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! जो सम्पूर्ण प्राणियों के उदर में स्थित होकर उनके खाए हुए पदार्थों को पचाता है, वही अग्निपुत्र बृहस्पति के (चौथे) रूप में सम्पूर्ण लोकों में प्रकट हुआ है, जो 'विश्वभुक' नाम से प्रसिद्ध है॥17॥
 
Bharatnandan! The one who is present in the stomach of all living beings and digests their eaten substances, has appeared in all the worlds in the form of the (fourth) son of Agni Brihaspati, famous by the name of 'Vishwabhuk'. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)