Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.217.9: उन दिनों अग्निदेव भी तप कर रहे थे। वे अत्यन्त तेजस्वी होते हुए भी अंगिरा के तेज से अत्यन्त व्यथित हो गए और अत्यन्त मलिन हो गए। किन्तु इसका कारण क्या है? वे कुछ भी समझ नहीं पा रहे थे॥9॥ | mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तपश्चरंस्तु हुतभुक् संतप्तस्तस्य तेजसा।
भृशं ग्लानश्च तेजस्वी न च किंचित् प्रजज्ञिवान्॥ ९॥
अनुवाद
उन दिनों अग्निदेव भी तप कर रहे थे। वे अत्यन्त तेजस्वी होते हुए भी अंगिरा के तेज से अत्यन्त व्यथित हो गए और अत्यन्त मलिन हो गए। किन्तु इसका कारण क्या है? वे कुछ भी समझ नहीं पा रहे थे॥9॥
During those days Agnidev was also doing penance. Despite being very radiant, he was very upset with Angira's brilliance and became very dirty. But what is the reason for this? He could not understand anything.॥ 9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥