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mahabharat 3.217.6: मार्कण्डेय बोले, 'हे राजन! इस विषय को जानने वाले लोग प्राचीन इतिहास का वर्णन करते हैं, जिसमें बताया गया है कि किस प्रकार क्रोधित अग्निदेव तपस्या के लिए जल में प्रविष्ट हुए।   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.217.6 
मार्कण्डेय उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
यथा क्रुद्धो हुतवहस्तपस्तप्तुं वनं गत:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय बोले, 'हे राजन! इस विषय को जानने वाले लोग प्राचीन इतिहास का वर्णन करते हैं, जिसमें बताया गया है कि किस प्रकार क्रोधित अग्निदेव तपस्या के लिए जल में प्रविष्ट हुए।
 
Mārkaṇḍeya said, 'O King! People having knowledge of this subject narrate the ancient history in which it is explained that how the angry Agnidev entered the water for penance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)