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mahabharat 3.217.5: भृगुकुलतिलक महामुने! मैं यह सब कथा आपके मुख से यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ, इसके लिए मेरे मन में बड़ी उत्सुकता है। 5॥   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.217.5 
एतदिच्छाम्यहं त्वत्त: श्रोतुुं भार्गवसत्तम।
कौतूहलसमाविष्टो याथातथ्यं महामुने॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भृगुकुलतिलक महामुने! मैं यह सब कथा आपके मुख से यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ, इसके लिए मेरे मन में बड़ी उत्सुकता है। 5॥
 
Bhrigukulatilak Mahamune! I want to hear all this story in reality from your mouth, for this I have great eagerness in my mind. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)