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mahabharat 3.217.21: अब मैं महान तेज वाली विभिन्न अग्नियों का वर्णन करूँगा, जो विभिन्न कर्मों के माध्यम से विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ब्राह्मण शास्त्रों में वर्णित अनुष्ठान वाक्यों में प्रसिद्ध हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.217.21 
तत्र नानाविधानग्नीन् प्रवक्ष्यामि महाप्रभान्।
कर्मभिर्बहुभि: ख्यातान्नानार्थान् ब्राह्मणेष्विह॥ २१॥
 
 
अनुवाद
अब मैं महान तेज वाली विभिन्न अग्नियों का वर्णन करूँगा, जो विभिन्न कर्मों के माध्यम से विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ब्राह्मण शास्त्रों में वर्णित अनुष्ठान वाक्यों में प्रसिद्ध हैं।
 
Now I will describe the various fires of great brightness, which are famous in the ritual sentences given in Brahman scriptures for achieving various purposes through various actions.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसके प्रसंगमें

दो सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१७॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)