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mahabharat 3.217.17: अंगिरा ने कहा - अग्निदेव! आप अपने लोगों को स्वर्ग प्राप्ति कराने वाले पुण्य कार्य (देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य) को पूर्ण करें और स्वयं अंधकार को दूर करने वाले अग्नि के आसन पर प्रतिष्ठित हों; साथ ही मुझे भी अपने प्रथम पुत्र के रूप में स्वीकार करें॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.217.17 
अंगिरा उवाच
कुरु पुण्यं प्रजास्वर्ग्यं भवाग्निस्तिमिरापह:।
मां च देव कुरुष्वाग्ने प्रथमं पुत्रमञ्जसा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अंगिरा ने कहा - अग्निदेव! आप अपने लोगों को स्वर्ग प्राप्ति कराने वाले पुण्य कार्य (देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य) को पूर्ण करें और स्वयं अंधकार को दूर करने वाले अग्नि के आसन पर प्रतिष्ठित हों; साथ ही मुझे भी अपने प्रथम पुत्र के रूप में स्वीकार करें॥17॥
 
Angira said – Agnidev! You should complete the virtuous work (the work of delivering offerings to the gods) that will help your people attain heaven and yourself be established on the pedestal of fire that removes darkness; Also please accept me as your first son. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)