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mahabharat 3.217.16: मैं अपनी अग्नि तुममें स्थापित करता हूँ, तुम प्रथम अग्नि का स्थान ग्रहण करो। मैं प्रजापत्य नामक दूसरी अग्नि होऊँगा ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.217.16 
निक्षिपाम्यहमग्नित्वं त्वमग्नि: प्रथमो भव।
भविष्यामि द्वितीयोऽहं प्राजापत्यक एव च॥ १६॥
 
 
अनुवाद
मैं अपनी अग्नि तुममें स्थापित करता हूँ, तुम प्रथम अग्नि का स्थान ग्रहण करो। मैं प्रजापत्य नामक दूसरी अग्नि होऊँगा ॥16॥
 
I place my fire in you, you should occupy the position of the first fire. I will be the second fire named Prajapatya. ॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)