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mahabharat 3.217.15: अग्निदेव बोले- मुनि! संसार में मेरी प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है। अब आप ही अग्नि के रूप में विराजमान हैं। लोग आपको अग्नि ही मानेंगे, आपके समक्ष मुझे कोई अग्नि नहीं मानेगा॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.217.15 
अग्निरुवाच
नष्टकीर्तिरहं लोके भवान् जातो हुताशन:।
भवन्तमेव ज्ञास्यन्ति पावकं न तु मां जना:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
अग्निदेव बोले- मुनि! संसार में मेरी प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है। अब आप ही अग्नि के रूप में विराजमान हैं। लोग आपको अग्नि ही मानेंगे, आपके समक्ष मुझे कोई अग्नि नहीं मानेगा॥ 15॥
 
Agnidev said- Muni! My reputation in the world has been destroyed. Now you alone are enthroned as Agni. People will consider you as Agni, no one will consider me as Agni in front of you.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)