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mahabharat 3.217.12-13: यह देखकर वह भयभीत होकर उनके पास गया। उस समय अंगिरा ऋषि ने उससे कहा - 'हे प्रभु! आप शीघ्र ही संसार की प्रिय अग्नि के पद पर पुनः प्रतिष्ठित हो जाएँ; क्योंकि आप तीनों लोकों में तथा स्थावर-जंगम प्राणियों में विख्यात हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.217.12-13 
सोपासर्पच्छनैर्भीतस्तमुवाच तदाङ्गिरा:॥ १२॥
शीघ्रमेव भवस्वाग्निस्त्वं पुनर्लोकभावन:।
विज्ञातश्चासि लोकेषु त्रिषु संस्थानचारिषु॥ १३॥
 
 
अनुवाद
यह देखकर वह भयभीत होकर उनके पास गया। उस समय अंगिरा ऋषि ने उससे कहा - 'हे प्रभु! आप शीघ्र ही संसार की प्रिय अग्नि के पद पर पुनः प्रतिष्ठित हो जाएँ; क्योंकि आप तीनों लोकों में तथा स्थावर-जंगम प्राणियों में विख्यात हैं।
 
Seeing this, he went to him with fear. At that time sage Angira said to him - 'O Lord! You should soon be re-established in the position of Agni, the favourite fire of the world; because you are famous in all the three worlds and among the mobile and immobile creatures.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)