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mahabharat 3.217.11-12h: ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी तपस्या के कारण मेरी अग्नि नष्ट हो गई है। अब मैं पुनः अग्नि कैसे बन सकता हूँ?’ ऐसा विचार करते समय उन्होंने देखा कि महर्षि अंगिरा अग्नि के समान चमक रहे हैं और समस्त जगत को तपा रहे हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  3.217.11-12h 
अग्नित्वं विप्रणष्टं हि तप्यमानस्य मे तप:।
कथमग्नि: पुनरहं भवेयमिति चिन्त्य स:॥ ११॥
अपश्यदग्निवल्लोकांस्तापयन्तं महामुनिम्।
 
 
अनुवाद
ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी तपस्या के कारण मेरी अग्नि नष्ट हो गई है। अब मैं पुनः अग्नि कैसे बन सकता हूँ?’ ऐसा विचार करते समय उन्होंने देखा कि महर्षि अंगिरा अग्नि के समान चमक रहे हैं और समस्त जगत को तपा रहे हैं।
 
It seems that due to my penance my fire-ness has been destroyed. How can I become fire again now?' While thinking this he saw that the great sage Angira was shining like fire and heating the entire world. 11 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)