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mahabharat 3.217.10: तब अग्निदेव ने सोचा - 'हो न हो, ब्रह्माजी ने इस संसार के लिए एक और अग्निदेव की रचना कर दी है।' ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 217: अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.217.10 
अथ संचिन्तयामास भगवान् हव्यवाहन:।
अन्योऽग्निरिह लोकानां ब्रह्मणा सम्प्रकल्पित:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
तब अग्निदेव ने सोचा - 'हो न हो, ब्रह्माजी ने इस संसार के लिए एक और अग्निदेव की रचना कर दी है।' ॥10॥
 
Then Lord Agni thought – 'It may or may not happen, Lord Brahma has created another fire god for this world.' 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)