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mahabharat 3.216.7-8h: नरश्रेष्ठ! तब उन्होंने स्वयं मुझ पर कृपा की। द्विजश्रेष्ठ! तत्पश्चात् मैंने उनके शरीर से बाण निकालकर उन्हें उनके आश्रम में भेज दिया। परन्तु वे नहीं मरे। 7 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान  »  श्लोक 7-8h
 
 
श्लोक  3.216.7-8h 
प्रसादश्च कृतस्तेन ममैव द्विपदां वर।
शरं चोद्‍धृतवानस्मि तस्य वै द्विजसत्तम॥ ७॥
आश्रमं च मया नीतो न च प्राणैर्व्ययुज्यत।
 
 
अनुवाद
नरश्रेष्ठ! तब उन्होंने स्वयं मुझ पर कृपा की। द्विजश्रेष्ठ! तत्पश्चात् मैंने उनके शरीर से बाण निकालकर उन्हें उनके आश्रम में भेज दिया। परन्तु वे नहीं मरे। 7 1/2॥
 
Narashrestha! Then he himself showed favor to me. Dwijshreshtha! Thereafter I took out the arrow from his body and sent him to his ashram. But he did not die. 7 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)