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mahabharat 3.216.37: हे विद्वान्! यह कथा सुनने में इतनी सुखद लगी कि मुझे दो घण्टे का समय लग गया। हे प्रभु! आपके मुख से धर्म की यह महान कथा सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। 37.   |   mahabharat अध्याय 3.216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.216.37 
सुखश्रव्यतया विद्वन् मुहूर्त इव मे गत:।
न हि तृप्तोऽस्मि भगवन् शृण्वानो धर्ममुत्तमम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे विद्वान्! यह कथा सुनने में इतनी सुखद लगी कि मुझे दो घण्टे का समय लग गया। हे प्रभु! आपके मुख से धर्म की यह महान कथा सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। 37.
 
Learned one! This story was so pleasant to listen to that my time seemed like just two hours. O Lord! I am not getting satisfied listening to this great story of religion from your mouth. 37.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे षोडशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याधसंवादविषयक

दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१६॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)