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mahabharat 3.216.15-16h: कर्म के दोषों के कारण ही मनुष्य घोर एवं भयंकर स्थिति में पड़ता है। परन्तु हे पुरुषोत्तम! मैं समझता हूँ कि तुम्हारे कर्म के सभी दोष सर्वथा नष्ट हो गए हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  3.216.15-16h 
कर्मदोषेण विषमां गतिमाप्नोति दारुणाम्॥ १५॥
क्षीणदोषमहं मन्ये चाभितस्त्वां नरोत्तम।
 
 
अनुवाद
कर्म के दोषों के कारण ही मनुष्य घोर एवं भयंकर स्थिति में पड़ता है। परन्तु हे पुरुषोत्तम! मैं समझता हूँ कि तुम्हारे कर्म के सभी दोष सर्वथा नष्ट हो गए हैं।
 
It is because of the defects of karma that a man falls into a terrible and dreadful state. But, O best of men! I think that all the defects of your karma have been completely destroyed. 15 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)