Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.216.14-15h: इसके विपरीत मैं उसे ब्राह्मण मानता हूँ जो शूद्र होते हुए भी अनुशासन, संयम, सत्य और धर्म का पालन करने में सदैव तत्पर रहता है; क्योंकि मनुष्य अपने अच्छे आचरण से ही ब्राह्मण बनता है ॥14 1/2॥ | mahabharat अध्याय 3.216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थित:॥ १४॥
तं ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद् द्विज:।
अनुवाद
इसके विपरीत मैं उसे ब्राह्मण मानता हूँ जो शूद्र होते हुए भी अनुशासन, संयम, सत्य और धर्म का पालन करने में सदैव तत्पर रहता है; क्योंकि मनुष्य अपने अच्छे आचरण से ही ब्राह्मण बनता है ॥14 1/2॥
On the contrary, I consider him a Brahmin who, in spite of being a Shudra, is always ready to follow discipline, self-control, truth and Dharma; because a man becomes a Brahmin only by his good conduct. ॥ 14 1/2 ॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥