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mahabharat 3.216.13-14h: मैं अब भी तुम्हें ब्राह्मण मानता हूँ। तुम्हारे ब्राह्मण होने में कोई संदेह नहीं है। जो ब्राह्मण होकर भी अधोगति की ओर ले जाने वाले पापकर्मों में लगा रहता है, अधिकतर बुरे कर्मों में ही लगा रहता है और पाखंडी है, वह शूद्र के समान है।   |   mahabharat अध्याय 3.216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  3.216.13-14h 
साम्प्रतं च मतो मेऽसि ब्राह्मणो नात्र संशय:।
ब्राह्मण: पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु॥ १३॥
दाम्भिको दुष्कृत: प्राय: शूद्रेण सदृशो भवेत्।
 
 
अनुवाद
मैं अब भी तुम्हें ब्राह्मण मानता हूँ। तुम्हारे ब्राह्मण होने में कोई संदेह नहीं है। जो ब्राह्मण होकर भी अधोगति की ओर ले जाने वाले पापकर्मों में लगा रहता है, अधिकतर बुरे कर्मों में ही लगा रहता है और पाखंडी है, वह शूद्र के समान है।
 
I still consider you a Brahmin. There is no doubt about your being a Brahmin. One who, despite being a Brahmin, is stuck in sinful acts that lead to degradation and is mostly engaged in bad deeds and is a hypocrite, is like a Shudra. 13 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)