Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.216.1-2: धर्मव्याध कहते हैं - हे ब्राह्मण! जब ऋषि ने मुझे इस प्रकार शाप दिया, तब मैंने कहा - 'हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए - मुझे बचाइए। ऋषिवर! आज मुझसे अनजाने में यह अनुचित कार्य हो गया है। आप मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दीजिए और मुझ पर प्रसन्न होइए।' ऐसा कहकर मैंने उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया।॥1-2॥ | mahabharat अध्याय 3.216: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
धर्मव्याध कहते हैं - हे ब्राह्मण! जब ऋषि ने मुझे इस प्रकार शाप दिया, तब मैंने कहा - 'हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए - मुझे बचाइए। ऋषिवर! आज मुझसे अनजाने में यह अनुचित कार्य हो गया है। आप मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दीजिए और मुझ पर प्रसन्न होइए।' ऐसा कहकर मैंने उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया।॥1-2॥
Dharmavyadh says - O Brahmin! When the sage cursed me in this manner, I said - 'O Lord! Please protect me - please save me. Sage! I have done this wrong thing today unknowingly. Please forgive all my sins and be pleased with me.' Saying this, I tried to please him.॥ 1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥