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mahabharat 3.215.30: मैंने साहस जुटाकर उस ऋषि से कहा - 'प्रभु! मुझसे अनजाने में यह अपराध हो गया है। अतः मुझे क्षमा करें।'   |   mahabharat अध्याय 3.215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.215.30 
अजानता कृतमिदं मयेत्यहमथाब्रुवम्।
क्षन्तुमर्हसि मे सर्वमिति चोक्तो मया मुनि:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
मैंने साहस जुटाकर उस ऋषि से कहा - 'प्रभु! मुझसे अनजाने में यह अपराध हो गया है। अतः मुझे क्षमा करें।'
 
I gathered courage and said to that sage - 'Lord! I have committed this crime unknowingly. So please forgive me.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)