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mahabharat 3.215.28: हे प्रभु! मैंने उसे जंगली जानवर समझकर बाण चलाया था। इसलिए मैं अचानक उसके पास पहुँच गया। वहाँ पहुँचकर मैंने देखा कि एक ऋषि उस बाण से घायल होकर, जिसकी नोक मुड़ी हुई थी, भूमि पर पड़े थे।   |   mahabharat अध्याय 3.215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.215.28 
मन्वानस्तं मृगं चाहं सम्प्राप्त: सहसा प्रभो।
अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मैंने उसे जंगली जानवर समझकर बाण चलाया था। इसलिए मैं अचानक उसके पास पहुँच गया। वहाँ पहुँचकर मैंने देखा कि एक ऋषि उस बाण से घायल होकर, जिसकी नोक मुड़ी हुई थी, भूमि पर पड़े थे।
 
O Lord! I had shot an arrow at him thinking him to be a wild animal. So I suddenly reached near him. On reaching there I saw that a sage was lying on the ground after being injured by that arrow with a bent tip.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)