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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना
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श्लोक 18
श्लोक
3.215.18
मातापितृभ्यां शुश्रूषां करिष्ये वचनात् तव।
नाकृतात्मा वेदयति धर्माधर्मविनिश्चयम्॥ १८॥
अनुवाद
मैं आपके कहे अनुसार अपने माता-पिता की सेवा करूँगा। जिसका अंतःकरण शुद्ध नहीं है, वह उचित अनुचित का भेद नहीं कर सकता ॥18॥
I will serve my parents as you say. One whose conscience is not pure cannot tell what is right and wrong. ॥18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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