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mahabharat 3.215.14: ब्राह्मण बोला - हे पुरुषश्रेष्ठ! यह मेरा बड़ा सौभाग्य है कि मैं यहाँ आया और सौभाग्य से ही मुझे आपके सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। धर्म का मार्ग बताने वाले आप जैसे लोग संसार में दुर्लभ हैं॥ 14॥   |   mahabharat अध्याय 3.215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.215.14 
ब्राह्मण उवाच
इहाहमागतो दिष्टॺा दिष्टॺा मे सङ्गतं त्वया।
ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शका:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला - हे पुरुषश्रेष्ठ! यह मेरा बड़ा सौभाग्य है कि मैं यहाँ आया और सौभाग्य से ही मुझे आपके सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। धर्म का मार्ग बताने वाले आप जैसे लोग संसार में दुर्लभ हैं॥ 14॥
 
The Brahmin said - O best of men! It was my great fortune that I came here and by good fortune I was able to be in your company. People like you who show the path of religion are rare in the world.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)