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mahabharat 3.215.1: मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! इस प्रकार धर्मात्मा व्याधने कौशिक ब्राह्मण को उसके माता-पिता रूपी दोनों गुरुओं का दर्शन कराकर पुनः उससे इस प्रकार कहा-॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.215.1 
मार्कण्डेय उवाच
गुरुं निवेद्य विप्राय तौ मातापितरावुभौ।
पुनरेव स धर्मात्मा व्याधो ब्राह्मणमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! इस प्रकार धर्मात्मा व्याधने कौशिक ब्राह्मण को उसके माता-पिता रूपी दोनों गुरुओं का दर्शन कराकर पुनः उससे इस प्रकार कहा-॥1॥
 
Markandeyaji says- Yudhishthir! In this way, the virtuous Vyadhane, after giving darshan of both his teachers in the form of his parents to Kaushik Brahmin, again said to him in this way -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)