श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 214: माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.214.28 
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम।
भवेयुरग्नयस्तस्य परिचीर्णास्तु नित्यश:।
गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य एष धर्म: सनातन:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! जो इन सबके प्रति अच्छा आचरण करता है और गृहस्थ धर्म का पालन करता है, वह सदैव सभी अग्नियों की सेवा करेगा। यही सनातन धर्म है। 28॥
 
Dwijshreshtha! The one who behaves well towards all these and follows the householder's religion will always serve all the fires. This is Sanatan Dharma. 28॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक दो सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)