श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 214: माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.214.23 
एतदर्थं मम प्राणा भार्या पुत्र: सुहृज्जन:।
सपुत्रदार: शुश्रूषां नित्यमेव करोम्यहम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
मेरा जीवन, पत्नी, पुत्र और मित्र सब उनकी सेवा के लिए हैं। मैं अपनी पत्नी और पुत्रों के साथ प्रतिदिन उनकी सेवा में लगा रहता हूँ॥ 23॥
 
My life, wife, sons and friends are all for His service. Along with my wife and sons, I remain engaged in His service every day.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)