श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 214: माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.214.17 
मार्कण्डेय उवाच
बाढमित्येव तौ विप्र: प्रत्युवाच मुदान्वित:।
धर्मव्याधो निरीक्ष्याथ ततस्तं वाक्यमब्रवीत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - हे राजन! तब कौशिक ब्राह्मण ने प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया - 'हाँ, मुझे कोई दुःख नहीं हुआ।' तत्पश्चात् धर्मव्याध ने अपने पिता और माता की ओर देखकर कौशिक ब्राह्मण से कहा॥17॥
 
Mārkaṇḍeya says, O King! Then Kaushik brahmin replied to him happily, 'Yes, I have not suffered any pain.' Thereafter Dharmavyādha looked towards his father and mother and said to Kaushik brahmin॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)