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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 214: माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन
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श्लोक 12
श्लोक
3.214.12
मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीयते।
न चान्या हि तथा बुद्धिर्दृश्यते साम्प्रतं तव॥ १२॥
अनुवाद
आप मन, वचन और कर्म से हमारी सेवा करना कभी नहीं छोड़ते। अब भी आपके विचार इसके विपरीत नहीं लगते॥12॥
You never stop serving us through your thoughts, words and actions. Even now your thoughts do not seem to be contrary to this.॥ 12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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