(अव्यक्तं सत्त्वसंज्ञं च जीव: काल: स चैव हि।
प्रकृति: पुरुषश्चैव प्राण एव द्विजोत्तम॥
जागर्ति स्वप्नकाले च स्वप्ने स्वप्नायते च स:।
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! प्राण ही अव्यक्त, सार, आत्मा, काल, प्रकृति और पुरुष है। वह जाग्रत अवस्था में भी जागृत रहता है। स्वप्न काल में स्वप्न जगत की रचना करने वाला तथा स्वप्न अवस्था की प्राप्ति के लिए समस्त प्रयत्न करने वाला भी वही है।
Dwijshreshtha! Prana itself is unmanifested, essence, soul, time, nature and man. He remains awake in the waking state. He is the one who creates the dream world during the dream period and makes all the efforts to achieve the dream state.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)